सवा मन सोना रोज उपहार में देती थी कर्णा देवी  

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आस्था के इस मंदिर की खासियत मंदिर में मौजूद खंडित मूर्तियां हैं, जिन्हें देखने के लिए प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। भक्तों का मानना है कि इन खंडित मूर्तियों के दर्शन करने भर से मां कर्णा देवी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण कर देती हैं। भक्त इस मंदिर को चमत्कारी मंदिर मानने के साथ यहां की खंडित मूर्तियों के प्रति भी आकर्षित हैं। इस मंदिर देवी की मूर्ति के साथ प्राचीन शिवलिंग और अन्य मूर्तियां भी खंडित अवस्था में विराजमान हैं।
औरैया की बीहड़ी सीमा पर यमुना नदी के किनारे बसा कर्णा देवी के मंदिर का निर्माण 2 हजार वर्ष पहले राजा कर्ण ने कराया था। भक्त मां कर्णा देवी के साथ राजा कर्ण में भी अटूट विश्वास रखते हैं। दानवीर राजा मां कर्ण देवी के आशीर्वाद से प्राप्त सवा मन सोना प्रतिदिन दीन दुखियों औऱ अपनी प्रजा में बांटा करते थे। कहते हैं राजा कर्ण ने अपना शरीर खौलते तेल डालकर मां कर्णा देवी को समर्पित कर दिया था, जिससे प्रसन्न होकर कर्णा देवी प्रतिदिन उन्हें सवा मन सोना उपहार देती थी।
मंदिर का राज जानने के इच्छुक उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने राजा कर्ण के यहां नौकरी कर ली। एक दिन राजा कर्ण का भेष धारण कर कर्णा देवी के सामने गए लेकिर मां कर्णा देवी ने उन्हें पहचान लिया और इच्छा वरदान मांगने को कहा। इस पर राजा विक्रमादित्य ने उन्हें उज्जैन के लिए आमंत्रित किया, जिस पर उन्होंने इन्कार कर दिया। इससे क्रोधित हो राजा विक्रमादित्य ने उन पर तलवार से प्रहार किया, जिससे मूर्ति दो टुकड़ों में बंट गई। इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने मूर्ति का आधा धड़ उज्जैन में स्थापित कर दिया, जिसकी आज भी हरि सिद्धि देवी के नाम से पूजा होती है। आधी खंडित मूर्ति को भक्त कर्णा देवी के नाम से पूजते हैं।
अगर आप भी मां कर्णा देवी के मंदिर पहुंचकर मनोकामना पूर्ति करने के साथ वहां की खंडित मूर्तियों को निहारने चाहते हैं तो सबसे पहले मां कर्णा देवी के मंदिर जाने के लिए औरैया से भीखेपुर पहुंचें। वहां से बस, टेम्पो या अन्य किसी वाहन के माध्यम से जालौन की तरफ जाएं। जनपद की सीमा के पास मां कर्णा देवी का मंदिर यमुना नदी के किनारे बसा है। दिल को छू लेने वाली आकृति से बना यह मंदिर आस्था और श्रद्धा का एक बड़ा उदाहरण है।

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